Friday, 12 February 2016

आहिस्ता चल जिंदगी,अभी

mukesh sulakhiya

mukesh sulakhiya


सुलगते ख्वाबों पर पलकों का पहरा हैं 

भोर होते ही जमीनी हकीकत ने घेरा हैं ......

**********


एक बार मोहब्बत करके देखो ज़ख्मों से 
कायल हो जाओगे इनकी वफ़ाओं के ...
**********



जो आधार हैं एक परिवार की 
वो बोझ है सीने पर माँ - बाप के....
**********



दिन की सफेद चादर पर धब्बा हैं जो काला 

रात उसी स्याही से शराफत करती हैं मुँह काला..

1 comment: